क्या विकास के नाम पर हम विनाश के रास्ते पर हैं? पढ़िए हमारा वैश्विक घोषणापत्र | Co-Earth Movement | Develish One Foundation
एक नई क्रांति का आह्वान: Co-Earth आंदोलन
नमस्कार! मैं विशाल पाण्डेय, अपने भाई विमल पाण्डेय और मित्र सचिन सिंह के साथ मिलकर 'Develish One Foundation' नामक एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ, जिसकी स्थापना 7 अप्रैल 2025 को हुई थी।
हमने इस संस्था की शुरुआत एक बेहद स्पष्ट और क्रांतिकारी सोच के साथ की है—हम दुनिया के हर इंसान को इस संस्था से जोड़कर यह एहसास दिलाना चाहते हैं कि हमारी पृथ्वी की आज जो दुर्दशा हो रही है, उसकी ज़िम्मेदार कोई अकेली सरकार, कोई देश या कोई बड़ी कंपनी नहीं है, बल्कि हम और आप हैं। यह पूरी दुनिया और सरकारें हमीं से मिलकर बनी हैं। अगर हम ठान लें, तो हमारी यह धरती हमेशा वैसी ही सुंदर बनी रहेगी जैसी इसे प्रकृति ने बनाया था। और अगर हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ लें, तो करोड़ों जीव-जंतुओं के इस ख़ूबसूरत घर को हम खुद अपने हाथों से नर्क बना देंगे।
हम ही क्यों हैं ज़िम्मेदार? (आंकड़ों की कड़वी सच्चाई)
चलिए इस बात को तर्कों और गहराई से समझते हैं। यह समाज हमारे ही हर छोटे-बड़े निर्णय से प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए: पेयजल के अलावा, रोज़मर्रा की गतिविधियों (जैसे नहाने, कपड़े धोने) और टपकते नलों जैसी लापरवाही के कारण औसतन एक इंसान हर दिन लगभग 30 से 45 लीटर पानी बर्बाद कर देता है। पूरी दुनिया में जिन 5.8 अरब (8 Billion) लोगों तक पानी की पहुँच है, अगर वे इसी तरह बर्बादी करते रहें, तो यह आँकड़ा रोज़ाना 174 से 261 अरब लीटर तक पहुँच जाता है।
ज़रा सोचिए! यदि पानी की पहुँच वाले 5.8 अरब लोग रोज़ाना केवल 5 लीटर पानी बचा लें, तो हर दिन कुल 29 अरब लीटर पानी की बचत होगी। संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानकों के अनुसार, यह पानी 58 करोड़ वंचित लोगों की प्यास बुझा सकता है। यही है हमारी 'सूक्ष्म-ज़िम्मेदारी' (Micro-Responsibility)।
अप्राकृतिक ज़रूरतें और 'आधुनिक विकास' का भ्रम
हम इंसानों के अलावा भी पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे एक जटिल कोशिकीय संगठन से बने हैं। उन्हें भी जीवित रहने के लिए भोजन और पानी चाहिए। लेकिन हम इंसान प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हैं, उसे नष्ट करते हैं और उसे 'विकास' का नाम देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम इस तथाकथित विकास के बिना तो जी सकते हैं, लेकिन प्रकृति के बिना एक पल भी नहीं।
आज हमें एक नया ख़्वाब दिखाया जा रहा है—अरबों-खरबों डॉलर खर्च करके मंगल या किसी अन्य बंजर ग्रह पर जीवन बसाने का। लेकिन यह ख़्वाब दिखाने वाले वही पूंजीपति हैं जिन्हें केवल अपना मुनाफ़ा नज़र आता है। यह विकास नहीं, विनाश का रास्ता है। यानी कि ब्रह्मांड ने हमारे लिए पहले से ही लिमिट सेट करके रखा है यदि फिर भी मान लीजिए कि हमने किसी नए ग्रह को रहने लायक बना ही दिया तो फिर आपको क्या लगता है कि वहां कौन से लोग रहने जायेगा? जब आज दुनिया की 80% आबादी इतनी गरीब है कि वह अपने पूरे जीवन में अपने देश में नहीं घूम पाती यात्रा कर पाती तो फिर क्या वो उस नए ग्रह पर कभी जा पाएगी रहने के लिए? नहीं, वह इसी धरती पर निवास करेगी जो कि गैस चेंबर में बदल चुका होगा।
अब आप खुद सोचिए हमारे पास जो एकमात्र स्वर्ग जैसी धरती बचती है रहने लायक है जिसने हमें सब कुछ मुफ्त में दिया है। उसको ये बड़े-बड़े उद्योगपति और सरकारें मिलकर विकास के नाम पर नष्ट कर रहीं हैं अपने अंधे लालच के चक्कर में, जिसमें हमारा भी उतना ही बड़ा योगदान है।
"जब हम इस बनी-बनाई सुंदर धरती को नहीं बचा पा रहे हैं, तो क्या गारंटी है कि हम किसी दूसरे ग्रह पर शून्य से शुरुआत करके जीवन को हजारों सालों तक सुरक्षित रख पाएंगे? वहां सतत विकास (Sustainable Development) कैसे संभव होगा? यह पूरी तरह नामुमकिन है।"
हमारी पृथ्वी के पास आज भी हमें और आने वाली पीढ़ियों को हजारों सालों तक आसानी से जीवित रखने की क्षमता है, बशर्ते हम अपने अंधे लालच और असंतुष्टि को छोड़ दें। हम विज्ञान और जिज्ञासा के खिलाफ नहीं हैं, हम खिलाफ हैं उन लोगों के जो प्राकृतिक संसाधनों का गलत तरीके से प्रयोग कर रहें हैं और इसके बावजूद वो लोग न तो अपनी जिम्मेदारी प्रकृति के प्रति मानते हैं और न ही आने वाली पीढ़ियों के प्रति। हमें इसी सोच को बदलना है और इसकी शुरुआत हमें खुद से और अपने आस पास से करनी होगी।
कोई भी सरकार, बड़ी कंपनी या संस्था अकेले इस धरती को नहीं बचा सकती। इसके लिए दुनिया के सभी देशों और हर नागरिक को ग्राम पंचायत से देश के केंद्रीय स्तर तक सभी को एक साथ आना होगा। हमें बड़े चमत्कारों का इंतजार छोड़कर अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे कार्यों को पूरा करना होगा। यही हमारी असली जिम्मेदारी है।
यह एक अंतहीन आंदोलन है, जो केवल तभी रुकेगा जब:
- दुनिया का आख़िरी ग़रीब इंसान समृद्ध हो जाएगा।
- पेड़ों का कटना पूरी तरह बंद हो जाएगा।
- समुद्र में पड़ा आख़िरी कूड़ा निकाल लिया जाएगा।
- हर इंसान को स्वच्छ पानी और पोषण युक्त भोजन मिलने लगेगा।
- भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों का हनन जड़ से ख़त्म हो जाएगा।
नोट: हम किसी देश या सरकार के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हम दुनिया के सभी देशों के संविधानों और सभी धर्मों का दिल से आदर करते हैं। हम केवल असमानता, भ्रष्टाचार, नफ़रत, अंधश्रद्धा, युद्ध और शोषण के ख़िलाफ़ हैं।
विशाल कुमार पांडेय
निदेशक मंडल और अध्यक्ष
डेवलिश वन फाउंडेशन
📍 पता: C/o Bharat Lal, Ramva Pur, Katra, Shrawasti, Shravasti, Ikauna, Shrawasti - 271805, Uttar Pradesh
📧 Email: develishngo@gmail.com | develishngo@zohomail.in
📞 Call us: +91 9721061660, 9984839190, 9628591501
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