विकास या विनाश? ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट और हमारी सांसे: Develish One Foundation की एक गहरी पड़ताल Great Nicobar Mega Project
विकास की अंधी दौड़ में जब इंसान प्रकृति के सबसे अनमोल खजाने पर कुल्हाड़ी चलाने लगे, तो यह केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बन जाता है। भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित **ग्रेट निकोबार द्वीप समूह** इस समय एक ऐसे ही चौराहे पर खड़ा है।
सरकार की लगभग ₹72,000 करोड़ की 'ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट' (Great Nicobar Mega Project) योजना को लेकर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आम जनता में भारी चिंता है। Develish One Foundation एक पर्यावरण-अनुकूल समाज की वकालत करता है, और हमारा मानना है कि देश की सुरक्षा और आर्थिक तरक्की जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी इस धरती की सांसे भी हैं।
आइए, इस पूरे मामले को बहुत गहराई से और प्रामाणिक तथ्यों के साथ समझते हैं।
ग्रेट निकोबार की जैव-विविधता क्यों है इतनी अनमोल?
ग्रेट निकोबार केवल ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सबसे संवेदनशील और समृद्ध इकोसिस्टम में से एक है। इसे 'गैलापागोस ऑफ एशिया' भी कहा जाता है।
बायोस्फीयर रिजर्व और नेशनल पार्क: यह द्वीप एक घोषित 'बायोस्फीयर रिजर्व' है। इसमें 'गैलाथिया बे नेशनल पार्क' (Galathea Bay National Park) और 'कैम्पबेल बे नेशनल पार्क' शामिल हैं।
सदाबहार वर्षावन (Rainforests): यहाँ दुनिया के सबसे प्राचीन और घने उष्णकटिबंधीय सदाबहार वर्षावन (Tropical Evergreen Rainforests) पाए जाते हैं, जो कार्बन को सोखने (Carbon Sink) का बहुत बड़ा काम करते हैं।
दुर्लभ जीव-जंतु: यह द्वीप 'जायंट लेदरबैक टर्टल' (Giant Leatherback Turtle)—जो दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है—उसका सबसे मुख्य अंडा देने का स्थान (Nesting Site) है। इसके अलावा, यहाँ केवल निकोबार में पाया जाने वाला 'निकोबारी मेगापोड' (एक दुर्लभ पक्षी), 'क्रैब-ईटिंग मकाक' (दुर्लभ बंदर) और दुनिया की सबसे बड़ी केकड़ा प्रजाति 'रॉबर क्रैब' पाई जाती है।
आदिम जनजातियाँ: यह 'शोम्पेन' (Shompen) और 'निकोबारी' जनजातियों का घर है, जो हज़ारों सालों से बिना बाहरी दुनिया के हस्तक्षेप के प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रह रही हैं।
इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को क्या नुकसान होने वाला है?
नीति आयोग और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO) की इस परियोजना में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक टाउनशिप और एक गैस व सौर-आधारित पावर प्लांट बनाना शामिल है।
Develish One Foundation इस प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय प्रभावों की कड़ी आलोचना करता है, क्योंकि इससे निम्नलिखित अपूरणीय क्षति (Irreversible Damage) होगी:
1. लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई (Mass Reforestation Crisis)
इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के प्राचीन और घने वर्षावन को काटा जाएगा। अनुमानों के मुताबिक, 8.5 लाख से 10 लाख के बीच पेड़ों को काटा जाना तय है। इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का कटना ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय जलवायु के लिए एक बड़ा विनाश साबित होगा।
2. कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) का विनाश
समुद्र के भीतर स्थित कोरल रीफ को 'समुद्र के वर्षावन' कहा जाता है। ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के निर्माण के कारण समुद्र के भीतर ड्रेजिंग (Dredging) होगी, जिससे हज़ारों कोरल कॉलोनियां नष्ट हो जाएंगी। समुद्री जीवों का पूरा आवास खत्म हो जाएगा।
3. दुर्लभ प्रजातियों का विलुप्त होना
'गैलाथिया बे' का बंदरगाह कछुओं के घोंसले बनाने के रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर देगा। शोर, जहाजों के तेल का रिसाव और इंसानी दखलंदाजी के कारण निकोबारी मेगापोड और अन्य एंडेमिक (स्थानिक) प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।
4. जनजातियों के अस्तित्व पर खतरा
शोम्पेन जनजाति एक 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) है, जिनकी आबादी मात्र कुछ सौ बची है। जंगलों के कटने से उनका प्राकृतिक रहन-सहन और भोजन का स्रोत छिन जाएगा, जो उनके अस्तित्व को ही मिटा सकता है।
सरकार के तर्क और तथ्य (Government's Perspective)
संतुलन के दृष्टिकोण से, सरकार ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के पीछे अपने कुछ बेहद ठोस तर्क और तथ्य भी सामने रखे हैं:
1. रणनीतिक महत्व (Strategic Location): ग्रेट निकोबार 'मलक्का जलडमरूमध्य' (Strait of Malacca) के बेहद करीब है, जहाँ से दुनिया का एक बहुत बड़ा समुद्री व्यापार गुजरता है। हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए इस द्वीप पर सैन्य और नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर का होना बेहद जरूरी है।
2. आर्थिक लाभ और रोजगार: सरकार का दावा है कि इस ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के बनने से भारत दुनिया के समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बनेगा, जिससे अरबों डॉलर का राजस्व (Revenue) और हज़ारों नौकरियां पैदा होंगी।
3. मुआवजा वनीकरण (Compensatory Afforestation): पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि निकोबार में कटे पेड़ों के बदले हरियाणा और अन्य मैदानी राज्यों में उतनी ही ज़मीन पर वनीकरण (पेड़ लगाने का काम) किया जाएगा। साथ ही, कछुओं और अन्य जीवों के संरक्षण के लिए अलग से बजट और कार्ययोजना तैयार की गई है।
पर्यावरण के मोर्चे पर सरकार के तर्कों की जमीनी हकीकत: NGO की आलोचना
Develish One Foundation सरकार के आर्थिक और रणनीतिक तर्कों का सम्मान करता है, लेकिन पर्यावरण के नाम पर दिए जा रहे 'वनीकरण' के तर्कों को पूरी तरह खारिज करता है:
"हरियाणा के मैदानी इलाकों में लगाए गए नए पौधे, निकोबार के हज़ारों साल पुराने वर्षावनों (Rainforests) का विकल्प कभी नहीं हो सकते।"
एक वर्षावन एक जटिल इकोसिस्टम होता है जिसमें मिट्टी, फंगस, कीट, पक्षी और पेड़ सब मिलकर लाखों सालों में एक जाल बुनते हैं। आप एक प्राचीन वर्षावन को काटकर किसी दूसरी जगह पर 'सोशल फॉरेस्ट्री' के तहत पेड़ लगाकर यह दावा नहीं कर सकते कि पर्यावरण को नुकसान नहीं हुआ है। यह प्रकृति के साथ एक छलावा है।
इसके अलावा, ग्रेट निकोबार उच्च भूकंपीय क्षेत्र (Zone V - Highly Seismic Zone) में आता है। साल 2004 की सुनामी में यह द्वीप कई फीट नीचे धंस गया था। ऐसे अत्यधिक संवेदनशील और सक्रिय टेक्टोनिक क्षेत्र में ₹72,000 करोड़ का भारी-भरकम कंक्रीट का ढांचा खड़ा करना आर्थिक और प्राकृतिक दोनों ही दृष्टि से एक बहुत बड़ा जुआ है।
निष्कर्ष: Develish One Foundation का आह्वान
प्रगति और प्रकृति के बीच का संतुलन कभी भी एक को मारकर दूसरे को जिंदा रखने से नहीं बन सकता। यदि हमें देश की सुरक्षा के लिए वहां कुछ निर्माण करना भी है, तो उसका पैमाना इतना विशाल (Mega) नहीं होना चाहिए कि वह वहां की पूरी पहचान और पर्यावरण को ही लील जाए।
याद रखिए, यदि हमारे पास सांस लेने के लिए शुद्ध हवा और बचाने के लिए प्रकृति ही नहीं बचेगी, तो हम इस आर्थिक महाशक्ति बनने का जश्न कहाँ मनाएंगे?
आइए, विकास के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा के लिए भी अपनी आवाज़ बुलंद करें!
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट और पर्यावरण के इस संकट पर आपकी क्या राय है? क्या देश की सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की यह बड़ी बलि देना सही है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें।
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