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प्रगति के नाम पर प्रकृति का विनाश: एक कड़वी हकीकत Is this development or disaster?


पिछले एक दशक में हमारे देश ने बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और सड़कों के जाल में अभूतपूर्व प्रगति की है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा स्याह सच छुपा है जिसे हम लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं। 'Develish One Foundation' देश के इस घटते 'ग्रीन कॉरिडोर' और कागजी वनीकरण की नीतियों पर गहरा सरोकार व्यक्त करता है।


 1. 10 साल पहले बनाम आज: आंकड़े क्या कहते हैं?


10 साल पहले (2016 के आसपास): जब देश में राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) या राज्यीय मार्गों का चौड़ीकरण शुरू नहीं हुआ था, तब प्रति 1 किलोमीटर के दायरे में औसतन 400 से 600 तक घने, पुराने और विशाल पेड़ (जैसे पीपल, नीम, बरगद, महुआ और आम) हुआ करते थे। ये सड़क किनारे चलने वालों को छांव और पर्यावरण को शुद्ध हवा देते थे।

आज की स्थिति (2026): इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर पिछले 10 सालों में करोड़ों पेड़ काटे गए। सरकार की रिपोर्टों के अनुसार, 'Compensatory Afforestation' (समानुपातिक वनीकरण) के तहत काटे गए 1 पेड़ के बदले 10 पौधे लगाने का दावा किया जाता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि आज प्रति 1 किलोमीटर की सड़क पर मुश्किल से 50 से 100 परिपक्व (Mature) पेड़ बचे हैं। जो नए पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से 75% से अधिक पौधे देखरेख के अभाव में पहले दो वर्षों में ही दम तोड़ देते हैं


 2. इस भारी गिरावट के मुख्य कारण (Why did this happen?)


अंधाधुंध चौड़ीकरण (Road Widening): हाईवे को 2-लेन से 4-लेन और 6-लेन बनाने के चक्कर में दशकों पुराने पेड़ों को जड़ से उखाड़ दिया गया।

कागजी वनीकरण की नीति (Faulty Compliance): पेड़ सड़क के किनारे से काटे जाते हैं, लेकिन उनके बदले नए पौधे किसी दूरदराज की बंजर भूमि या जंगलों में लगा दिए जाते हैं। नतीजा यह होता है कि सड़कों के किनारे का तापमान तेजी से बढ़ता है और प्रदूषण सीधे आबादी तक पहुँचता है।

दिखावटी और विदेशी पौधे (Monoculture): हमारे पारंपरिक और ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों (नीम, बरगद) की जगह सजावटी या विदेशी प्रजातियों (जैसे यूकेलिप्टस या कोनोकार्पस) को तरजीह दी गई, जो न तो स्थानीय पक्षियों को आश्रय देते हैं और न ही हमारे पर्यावरण के अनुकूल हैं।

जवाबदेही और बजट की बर्बादी: पौधे लगाने के लिए करोड़ों का बजट पास होता है, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए 'ट्री-गार्ड' या समय पर पानी देने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती।


 3. इसका समाज और पर्यावरण पर क्या प्रभाव हुआ? (The Impact)


भीषण गर्मी और हीटवेव (Heatwaves): ग्रीन कवर खत्म होने से सड़कों और आसपास के ग्रामीण/शहरी इलाकों का तापमान 3°C से 5°C तक बढ़ गया है

भूजल स्तर (Groundwater Depletion) में गिरावट: पुराने पेड़ों की जड़ें बारिश के पानी को रोककर जमीन के अंदर रीचार्ज करती थीं। उनके हटने से जलस्तर तेजी से नीचे भागा है।

जैव विविधता का खात्मा: सड़कों के किनारे लगे पेड़ों पर रहने वाले लाखों पक्षी, गिलहरियां और परागण करने वाले कीट-पतंगे पूरी तरह बेघर और नष्ट हो चुके हैं।


 Develish One Foundation की तरफ से तीखी आलोचना


"केवल पौधे रोपकर फोटो खिंचवा लेना पर्यावरण संरक्षण नहीं है। जब तक लगाए गए पौधों के जीवित रहने की दर (Survival Rate) 90% से ऊपर नहीं होती, तब तक हर साल मनाए जाने वाले वृक्षारोपण उत्सव महज़ एक सरकारी खानापूर्ति और बजट को ठिकाने लगाने का जरिया हैं।"

— Develish One Foundation


हम इस बात की कड़ी निंदा करते हैं कि विकास की नीतियों में पर्यावरण को हमेशा एक 'विकल्प' की तरह देखा जाता है, न कि एक 'अनिवार्यता' की तरह। ठेकेदारों को पेड़ काटने की अनुमति तो तुरंत मिल जाती है, लेकिन पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई सिर्फ फाइलों में दर्ज आंकड़ों से की जा रही है।


 हम इसे कैसे सही करने का प्रयास करेंगे? (Our Action Plan)


Develish One Foundation केवल कमियां निकालने में विश्वास नहीं रखता। हम इस संकट को जमीन पर उतरकर बदलने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। हमारा रोडमैप निम्नलिखित है:


'Plantation' नहीं, 'Sustenance' (संरक्षण पर जोर): हमारा संकल्प है कि हम जितने भी पौधे लगाएंगे, अगले 3 वर्षों तक उनके जीवित रहने, उन्हें पानी देने और ट्री-गार्ड से सुरक्षित रखने की शत-प्रतिशत ज़िम्मेदारी हमारी टीम की होगी।

मियावाकी पद्धति (Miyawaki Method) का उपयोग: कम जगह में घने और तीव्र गति से बढ़ने वाले जंगल तैयार करने के लिए हम इस जापानी तकनीक को अपनाएंगे, ताकि प्रति 1 किलोमीटर के दायरे में पेड़ों का घनत्व 10 गुना तक बढ़ाया जा सके।

स्थानीय और पारंपरिक प्रजातियों को प्राथमिकता: हम केवल भारत की मिट्टी के अनुकूल पेड़ जैसे नीम, पीपल, बरगद, शीशम, जामुन और सहजन ही लगाएंगे, जो लंबे समय तक टिकते हैं और भारी मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं।

डिजिटल जियो-टैगिंग (Geo-Tagging): हमारे द्वारा लगाए गए हर एक पौधे की जियो-टैगिंग की जाएगी, जिससे उसकी ग्रोथ और स्थिति को डिजिटली ट्रैक किया जा सके और पारदर्शिता बनी रहे।

जन-भागीदारी और 'Micro-Forests' की स्थापना: हम स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को जोड़कर 'वन-मित्र' बनाएंगे। प्रति 1 किलोमीटर के स्ट्रेच को स्थानीय समुदाय को गोद दिया जाएगा ताकि वे स्वयं अपने क्षेत्र की हरियाली की रक्षा कर सकें।


हम प्रगति के विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम ऐसा विकास चाहते हैं जो हमारी आने वाली पीढ़ियों की सांसें न छीने। Develish One Foundation देश के हर नागरिक से अपील करता है कि आइए, कागजी आंकड़ों से बाहर निकलकर ज़मीन पर पेड़ बचाएं और पेड़ बढ़ाएं।

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